हमारे शहर की गलियाँ
हमारे ही शेहरो की ये सड़कें
ये घर और मकान
ये नर्मदा जी का घाट और संगेमरमर के पहाड़
कहीं चाट का ठेला तो कहीं बनते पकवान
खोये की जलेबी और पोहे का जलपान
परसाई के व्यंग्य
और आस पास के सुन्दर ताल
संगीत से ले नाट्य शास्त्र में विख्यात
यही तो है
सुन्दर शांत हमारा शहर
पर न जाने क्यों रोता है दिल आज
देख
शहर में ये गंदे नाले
थूकता हुआ हर दूसरा इंसान
शौचालय सा बदबूदार चौक
कचरे से भरा अब ग्वारीघाट से तिलवारा घाट
फुवारे में चारो और थूका हुआ पान
गाड़ियों में चलते कुछ महान सड़के बनाते कूड़ादान
क्यूँ साफ़ करते सिर्फ खुद का ही आँगन
क्या दीखता नहीं उन्हें शहर का मान
ये तो नहीं संस्कारधानी के संस्कार
सिखाते नहीं गलत यहाँ के विद्वान
फिर क्यूँ संगेमरमर से सफ़ेद और साफ़ इस शहर को हमने बनाया यूँ कूडादान
अब उठो चलो साथ
करें इस कूड़े को साफ़
जोड़े खुद से स्वच्छ भारत अभियान
फिर से करें ऊँचा संस्कारधानी का हम नाम !!!!!!!!!!!!!!
सौरभ जयसवाल
भा ज पा युवा मोर्चा
जबलपुर